मंच की गरिमा या सियासी दिखावा? देहरादून की घटना ने खोली व्यवस्थाओं की पोल

देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में हुई हालिया घटना कोई साधारण विवाद नहीं है, बल्कि यह सत्ता, सिस्टम और समाज—तीनों की विफलता का आईना है। जिस मंच पर शिक्षा, संस्कृति और युवाओं के भविष्य की बात होनी चाहिए थी, वही मंच अभद्रता और अव्यवस्था का प्रतीक बन गया।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आजकल सरकारी और राजनीतिक उपस्थिति वाले कार्यक्रम सिर्फ फोटो-ऑप और दिखावे तक सीमित हो गए हैं? मुख्यमंत्री की मौजूदगी में सब कुछ व्यवस्थित और अनुशासित दिखता है, लेकिन उनके जाते ही मंच की मर्यादा तार-तार हो जाती है—यह व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करता है।

यह घटना सिर्फ एक गायक की गलती नहीं है। यह उस सिस्टम की नाकामी है, जिसने ऐसे कार्यक्रमों को बिना स्पष्ट दिशा-निर्देश और जवाबदेही के छोड़ दिया है। अगर मंच पर बैठे जनप्रतिनिधि और आयोजक मिलकर भी स्थिति को नियंत्रित नहीं कर पाए, तो सवाल उठना लाजिमी है कि जिम्मेदारी आखिर किसकी है?

और इससे भी बड़ा राजनीतिक संकेत यह है कि आज की राजनीति में जमीनी मुद्दों से ज्यादा इवेंट मैनेजमेंट को प्राथमिकता दी जा रही है। युवाओं के बीच संवाद, रोजगार, शिक्षा और भविष्य की बात करने के बजाय, मंचों को मनोरंजन का साधन बना दिया गया है—जहां नियंत्रण और मर्यादा दोनों ही गायब हैं।

पुलिस द्वारा नोटिस भेजना एक औपचारिक कार्रवाई भर है, लेकिन क्या इससे समस्या का समाधान होगा? असल जरूरत है जवाबदेही तय करने की—चाहे वह कलाकार हो, आयोजक हों या प्रशासन।

यह भी सोचने वाली बात है कि जब युवा इस तरह के कार्यक्रमों में ऐसी भाषा और व्यवहार देखते हैं, तो उनके मन में समाज और नेतृत्व के प्रति क्या संदेश जाता है? क्या हम अनजाने में एक ऐसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं, जहां लोकप्रियता जिम्मेदारी से बड़ी हो गई है?

अब वक्त आ गया है कि सरकार और संस्थान सिर्फ आयोजन करने तक सीमित न रहें, बल्कि उनकी गुणवत्ता, मर्यादा और जिम्मेदारी भी सुनिश्चित करें।
वरना ऐसे मंच, जो समाज को दिशा देने के लिए होते हैं, वही अराजकता और गैर-जिम्मेदारी के प्रतीक बनते रहेंगे।

सवाल सीधा है—क्या यह सिर्फ एक घटना है, या फिर सिस्टम की गहरी खामी का संकेत?