@हेमंत चौकियाल रूद्रप्रयाग (उत्तराखंड)
उत्तराखंड के चमोली जनपद में स्थित नौटी गाँव गढ़वाल राजा कनकपाल की ईष्ट देवी माँ नंदा की 12 वर्षों के बाद आयोजित की जाने वाली “राजजात” के लिए विश्व प्रसिद्ध है। हो भी क्यों नहीं, लगभग 287 कि०मी० की यह पैदल यात्रा 19 पड़ावों को पार करते हुए 6309 मीटर ऊँची नन्दा घुंघटी पर्वत पर 5335 मीटर तक की ऊँचाई तक जाती है, जिसमें लगभग 1.5 लाख से लेकर 2.5 लाख तक श्रद्धालु भाग लेते हैं। 18 दिनों तक चलने वाली यह यात्रा विश्व की सबसे लम्बी धार्मिक यात्रा होने का गौरव भी रखती है। हर बारह वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित होने वाली इस यात्रा पहले से नौटी में ही मोडवी नामक एक धार्मिक अनुष्ठान होता है। यह लगभग नंदा राजजात की ही प्रकृति और प्रवृति का अनुष्ठान है। संभावित अगस्त 2026 की राजजात के लिए यह आयोजन इस बार बीते 10 दिसम्बर 2024 को आयोजित हुआ था। इस अनुष्ठान के बाद यह माना जाता है कि जल्द ही क्षेत्र में कहीं चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाला मेढ़ा) जन्म लेगा। दिसम्बर 2024 के इस अनुष्ठान के बाद नंदा राजजात के 5वें पड़ाव कोटी गांव में चौसिंग्या खाडू (चार सींगों वाले मेंढे) का जन्म हो चुका है। जन्मने के तुरंत बाद इस खाडू की पहचान के लिए कुछ माह इंतजार करना पड़ता है। क्योंकि पारम्परिक रूप से जन्मने के बाद के दो सींगों के अलावा तीसरे व चौथा सींग प्रकट होने में कुछ समय लगता है। सामान्य सींगों से इतर ये बाद वाली सींगों की जोड़ी बहुत छोटी होती है।
इस बार खाडू जन्मने का सौभाग्य मिला है कर्णप्रयाग विकास खण्ड के कोटी गाँव को।कोटी गाँव के हरीश लाल के गोठ में माँ नंदा का यह वाहन (चौसिंग्या खाडू) जन्मा है। यह गाँव नंदा राजजात का 5वाँ पड़ाव भी है। पड़ाव के बाद इसी गाँव से होकर आगे बढ़ती है राजजात। मेंढे के जन्म की खबर मिलते ही राजजात समिति और जिला प्रशासन की तैयारियाँ तेज हो गईं हैं। जिला प्रशासन चमोली द्वारा माह जून से पहले ही 2026 की संभावित राजजात के लिए बैठकों का दौर प्रारंभ कर, निर्माण कार्यों जिनमें पुश्तों, पुलियाओं, रास्तों, पानी, बिजली व शौचालयों की व्यवस्था प्रमुख होती है, पर युद्ध स्तर पर कार्य प्रारंभ किया जा चुका है। नौटी सहित आसपास के प्रवासी लोगों ने अपने मकानों की मरम्मत करना शुरू कर दिया है। राजजात के दौरान ऐसा लगता है मानो पूरा भारत एक छोटे स्वरूप में यहाँ एकत्रित हो गया हो। भारतीय विदेश मन्त्रालय को विश्व के विभिन्न देशों में रह रहे प्रवासी गढ़वाल वासियों सहित अनेक भारतवासियों के उस दौरान भारत लौटने हेतु बीजा/पासपोर्ट बनवाने का दौर भी प्रारंभ हो गया है।
पाठकों को बताते चलें कि राजजात से
लगभग 2 साल पहले (कभी कभी इससे भी ज्यादा समय) एक और यात्रा प्रारंभ होती है जिसे मोडवी कहा जाता है। वर्ष 2026 में (संभावित) आयोजित होने वाली राजजात से पहले यह मोडवी यात्रा 10 दिसम्बर 2024 को आयोजित की गई, जिसमें लगभग 10 हजार श्रद्धालुओं ने भाग लिया था ।
बॉक्स में-…..
*उत्तराखंड में देवी देवताओं के साथ यहाँ के जनमानस के अपने रिश्ते नाते हैं। लाता गाँव में बुटोला लोगों के लिए नंदा देवी ध्याण (बेटी) है। राणा लोगों के लिए वह भानजी और रावत लोगों के लिए व्बारी (बहु) है। चमोली जनपद वालों के लिए नंदा केवल पौराणिक देवी मात्र ही नहीं है बल्कि वह चाँदपुर पट्टी वालों की बेटी और बधाण पट्टी वालों के लिए बहु है।*
*कौन हैं नंदा*
शिवपुराण के अनुसार – दक्ष प्रजापति द्वारा किए जा रहे दशा अश्वमेध यज्ञ में देवी सती के आत्मदाह के बाद शिव द्वारा मोहवश होकर अति रूदन-क्रनंद किया गया तब विष्णु द्वारा अपने चक्र से सती के मृत शरीर के टुकड़े – टुकड़े कर दिए गए। उनके शरीर के 51 टुकड़े अलग अलग स्थानों पर गिरे, आज यही स्थान सिद्धपीठ कहलाते हैं। इस घटना के कुछ समय बाद ऋषिकेश वासी हेमंत ऋषि की पत्नी माया (मैणा) के गर्भ से उसी आदिशक्ति सती पार्वती का पुनर्जन्म नंदा के रूप में हुआ, जो पुन:शिवजी को ब्याही गई।
हेमंत ऋषि के भाई भारद्वाज की संतति में एक प्रकांड पंडित आद्यगौड़ हुए। वे सातवीं शताब्दी में भ्रमण करते हुए धार मालवा गए और वहाँ पंवार वंश के राजा द्वारा गुरूपद से सम्मानित किये गये। उनके द्वारा राजा को बद्रीनाथ यात्रा हेतु प्रोत्साहित एवं आमंत्रित किया गया। कुछ समय बाद पंवार वंशीय राजकुमार कनकपाल बद्रीनाथ यात्रा हेतु हरिद्वार ऋषिकेश पहुँचे। इधर चाँदपुरगढ़ी के राजा भानुप्रताप की केवल दो पुत्रियाँ थी। राजवंश को आगे कैसे बढ़ाया जाय, राजा इस विषय में चिंतित थे। इसी दौरान भानुप्रताप को एक दिन बद्रीनाथ जी द्वारा आकाशवाणी हुई कि धार मालवा का राजकुमार हिमालय यात्रा पर आये हैं, इसलिए राजन तू हरिद्वार ऋषिकेश जाकर राजकुमार कनकपाल को मेरी यात्रा करवाने बद्री क्षेत्र में ले आओ। तत्पश्चात यात्रा पूरी होने पर उन्हें गढ़ी (चाँदपुर गढ़) लाकर अपनी छोटी कन्या का विवाह उनसे करवा दो। संपूर्ण राजपाट कनकपाल को सौंपकर मेरे धाम तपस्या हेतु आ जाओ। राजा भानुप्रताप ने बद्रीनाथ जी के कहे अनुसार ऐसा ही किया। सम्वत 745 विक्रमी में राजा कनकपाल चाँदपुर की गद्दी पर बैठे। चाँदपुर के पूर्व राजा भानुप्रताप देवताओं के बड़े भक्त थे। उनके पास दैविक शक्ति में संवाद करने के लिए ‘श्री यन्त्र’ था।, जिसे दैविक भाष्य यन्त्र कहा जाता था। इसके माध्यम से वे देवताओं के साथ भाष्य करते थे। यह ‘श्रीयन्त्र’ अब नौटी गाँव के नंदा मन्दिर में स्थापित है। राजा भानुप्रताप द्वारा बद्रीनाथ जी की पूजा दुर्ग (चाँदपुरगड़ी) के समीप ही आदिबदरी नामक स्थान पर की जाती थी तथा शिवजी की पूजा शैलेश्वर मठ में की जाती थी।
कुछ समय पश्चात राजा कनकपाल के पैतृक स्थान धार के नरेश देशाटन के लिए आये। कनकपाल के आग्रह पर वे चाँदपुरगड़ी आये। उनके साथ आद्य गौड़ भी आये (जो हेमंत ऋषि के संतति के प्रकांड पण्डित थे) उन्ही के साथ हिमवान पुत्री नंदा भी यहाँ आई। राजा कनकपाल द्वारा गौड़ ब्राह्मण और नंदा का श्रद्धा और प्रेम से सत्कार किया गया। इससे अभिभूत होकर नंदा ने राजा से मायका का रिश्ता कायम कर लिया। तब से उन्हें कनकपाल द्वारा राजराजेश्वरी नाम से पुकारा जाने लगा। उसी समय राजा ने श्रीनंदा से वचन लिया कि देवी जब भी आप मायके से ससुराल (हिमालय) को गमन करेंगी, तो विदाई चाँदपुरगड़ी के नरेश के यहाँ से होगी। देवी नंदा ने राजा के इस वचन को स्वीकार किया, जो आज भी परम्परा के रूप में राजजात के रूप में सम्पन्न होती है।
*अब राजजात चाँदपुर गढ़ी के बजाय नौटी से क्यों?*
नंदादेवी राजजात के इतिहास पर काम करते हुए इसकी कड़ियों को जोड़ने वाले नौटी गाँव की दिवंगत विभूति पं० देवराम नौटियाल जी ने अपने संस्मरणात्मक विवरणों में लिखा है कि राजा कनकपाल के छोटे भाई (काण्से भाई) चांदपुरगढ़ी के नजदीक जा बसे, उस स्थान का नाम काँसुवा पड़ा और वे काँसुवा के कुंवर पुकारे जाने लगे। राजा के गुरू आद्य गौड़ ब्राह्मण के भाई बन्धु गोदी नामक तोक में बसे। गोदी का अपभ्रंश ही नोटी हुआ और वे नौटियाल कहलाये। 8वीं सदी में राजा कनकपाल ने देवता भाष्य “श्री यन्त्र” को नौटी ले जाकर एक चबूतरे पर भूमिगत कर दिया। वहीं पर नौटी के राजपुरोहित द्वारा दैनिक विधि विधान से उस “श्री यन्त्र” की पूजा आज तक भी की जाती है। तब से यह स्थान नंदा देवी श्री पीठ के रूप में पूजा जाता है। नंदादेवी अपने पिता के स्थान ऋषिकेश से इस क्षेत्र से होते हुए ससुराल जाती थी तो देवी की उस विदाई यात्रा को राजजात कहते हैं।
*क्या कारण है कि राजजात बारह वर्षों बाद ही होती है*
16वीं शताब्दी के आसपास गढ़वाल नरेश मानशाह ने पश्चिमी तिब्बत अन्तर्गत दापा/दाबा के गढ़पति काकुवामोर को पराजित कर उससे प्रतिवर्ष एक चौसिंग्या खाडू व सवा सेर सोना गढ़राज्य को भेंट करने का वचन लिया था। गढ़वाल नरेश ने अपने छोटे भाई कांसुवा (गढ़वाळी में काण्सा का अर्थ छोटा) के राजकुंवर को प्रति बारहवें वर्ष नंदा राजजात करने की व्यवस्था का दायित्व सौंपा था जिसका निर्वहन वे तब से आज तक भी कर रहे हैं। आज भी राजजात समिति का अध्यक्ष पद कांसुवा के कुंवर परिवार व मंत्री पद नौटी के नौटियाल परिवारों हेतु नियत है। बारहवें वर्ष नौटी आकर कुंवर जब राजजात की मनौती करते हैं तो चमोली जिले के उस क्षेत्र में चौसिंग्या मेंढा पैदा हो जाता है जो भगवती नंदा द्वारा राजजात की स्वीकृति मानी जाती है।
*चौसिंग्या खाडू के पैदा होने के बाद*-
चौसिंग्या खाडू जिस परिवार के गोठ में जन्म लेता है वे उसे देवी का वाहन मानकर अपने आप को धन्य समझते हैं व बड़ी श्रद्धा से उसका लालन पालन करके हैं। इस खाडू के पैदा होने की सूचना कांसुवा के कुंवारों को दी जाती है। इसके बाद राजजात का होना निश्चित माना जाता है।
*राजजात की तिथि का निश्चय*-
खाडू के जन्म के बाद राजजात की तिथि निश्चित की जाती है। तिथि निश्चित हो जाने पर राजकुंवर शुभ मूहुर्त पर रिंगाल से बनी विशेष छतोली (जो छाते के आकार का होता है) व चौसिंग्या खाडू को लेकर अपने पुरोहितों के गाँव नौटी पहुँचते हैं। दूसरे दिन नौटी से ही राजजात का शुभारंभ होता है।
(लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ शिक्षक और साहित्यकार हैं।)




