दुबई से भारत तक: वीरेंद्र बसोया की वापसी और ड्रग तस्करी के खिलाफ भारत की बदलती रणनीति

रुम्मन उल्हा खान:-

विदेश में बैठे कथित ड्रग ऑपरेटरों तक पहुंचने की कोशिश तेज, NCB की जांच के सामने नेटवर्क की पूरी कड़ी तोड़ने की चुनौती

नई दिल्ली। भारत में ड्रग तस्करी के खिलाफ जांच अब केवल देश के भीतर पकड़े जाने वाले कैरियर और स्थानीय सप्लायरों तक सीमित नहीं रह गई है। जांच एजेंसियों का फोकस उन कथित ऑपरेटरों और नेटवर्क संचालकों तक पहुंचने पर भी है, जिन पर विदेश में बैठकर भारत में ड्रग सिंडिकेट संचालित करने के आरोप हैं।

UAE से कथित ड्रग सिंडिकेट के प्रमुख ऑपरेटर वीरेंद्र सिंह बसोया की भारत वापसी इसी बदलती जांच रणनीति के संदर्भ में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों का अंतिम निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से ही होगा।

बसोया के खिलाफ कार्रवाई को केवल एक आरोपी की गिरफ्तारी के तौर पर देखना पर्याप्त नहीं होगा। उसकी कथित भूमिका की जांच उन मामलों से जुड़ी बताई जा रही है, जिनमें पुणे, दिल्ली और गुजरात तक फैले बड़े सिंथेटिक ड्रग नेटवर्क की जांच हुई है। ऐसे में जांच एजेंसियों के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती इस पूरे नेटवर्क की ऊपरी और निचली दोनों कड़ियों को जोड़ने की है।

अमित शाह का ‘जीरो टॉलरेंस’ संदेश

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कार्रवाई को सरकार की ड्रग्स के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति से जोड़ते हुए स्पष्ट संदेश दिया है कि विदेश में छिपकर भारत में अवैध गतिविधियां संचालित करने वाले अपराधियों तक भी कानून की पहुंच बनाई जाएगी।

यह संदेश ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संचालित ड्रग नेटवर्क जांच एजेंसियों के लिए बड़ी चुनौती बन रहे हैं। भारत में ड्रग की बरामदगी के पीछे मौजूद वित्तीय स्रोत, अंतरराष्ट्रीय संपर्क, डिजिटल संचार और विदेशों में बैठे कथित संचालकों की पहचान करना जांच का अहम हिस्सा बन चुका है।

असली चुनौती ड्रग नहीं, पूरा नेटवर्क

किसी ड्रग मामले में एक खेप की बरामदगी जांच की शुरुआत हो सकती है, लेकिन असली सवाल नेटवर्क की संरचना का होता है।

ड्रग के लिए पैसा किसने लगाया?
उत्पादन या खरीद की व्यवस्था किसने की?
भंडारण और परिवहन कौन कर रहा था?
स्थानीय स्तर पर सप्लाई किसके माध्यम से हुई?
विदेशों में खरीदारों या सहयोगियों से संपर्क कौन कर रहा था?
और सबसे महत्वपूर्ण—पूरे नेटवर्क को निर्देश कौन दे रहा था?

यही वे सवाल हैं जिनके जवाब किसी अंतरराष्ट्रीय ड्रग सिंडिकेट की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।

जांच एजेंसियों के लिए नीचे से ऊपर और ऊपर से नीचे, दोनों दिशाओं में जांच करना इसलिए महत्वपूर्ण है। छोटे कैरियर या स्थानीय सप्लायर से नेटवर्क के संचालक तक पहुंचने के साथ-साथ कथित मुख्य ऑपरेटर से जुड़े लोगों और वित्तीय चैनलों की पहचान करना भी आवश्यक है।

1,837 किलोग्राम मेफेड्रोन की बरामदगी ने बढ़ाए सवाल

पुणे से शुरू हुई जांच में शुरुआती तौर पर लगभग 500 ग्राम मेफेड्रोन की बरामदगी की जानकारी सामने आई थी। इसके बाद जांच का दायरा बढ़ता गया।

जांच के दौरान पुणे से करीब 867 किलोग्राम और दिल्ली से करीब 970 किलोग्राम मेफेड्रोन बरामद किए जाने की जानकारी सामने आई। कुल मात्रा करीब 1,837 किलोग्राम तक पहुंचने से जांच का दायरा और गंभीर हो गया।

इतनी बड़ी मात्रा में सिंथेटिक ड्रग की बरामदगी कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करती है—इसके उत्पादन, भंडारण, परिवहन और वितरण के लिए कितने स्तरों पर नेटवर्क काम कर रहा था और इसके पीछे वित्तीय तथा लॉजिस्टिक व्यवस्था कौन संभाल रहा था?

यही वजह है कि बड़ी मात्रा में बरामद ड्रग को केवल जब्ती के आंकड़े के रूप में नहीं, बल्कि पूरे नेटवर्क की संरचना तक पहुंचने वाले संभावित सुराग के रूप में देखा जा सकता है।

दुबई से संचालित नेटवर्क जांच एजेंसियों के लिए चुनौती

पिछले कुछ वर्षों में जांच एजेंसियों के सामने ड्रग अपराध का एक जटिल स्वरूप सामने आया है—अपराध भारत में, लेकिन कथित नियंत्रण विदेश से।

ऐसे नेटवर्क में पैसा कई देशों के रास्ते घूम सकता है, संचार डिजिटल माध्यमों से हो सकता है और ड्रग की आपूर्ति एक से अधिक देशों से होकर गुजर सकती है। इससे जांच का दायरा केवल भारतीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहता।

ऐसे मामलों में इंटरपोल रेड नोटिस और विदेशी कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि इंटरपोल रेड नोटिस किसी व्यक्ति को दोषी घोषित नहीं करता। यह संबंधित व्यक्ति का पता लगाने और कानून के अनुसार अस्थायी गिरफ्तारी के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग का माध्यम है। किसी आरोपी की आपराधिक जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण अदालत करती है।

कथित 13 हजार करोड़ के नेटवर्क की जांच भी अहम

बसोया का नाम जिस दूसरे बड़े अंतरराष्ट्रीय ड्रग मामले की जांच से जोड़े जाने की बात सामने आई है, उसने इस पूरे मामले का दायरा और बढ़ा दिया है।

दिल्ली, हापुड़, गाजियाबाद और गुजरात के अंकलेश्वर तक हुई कार्रवाई तथा कोकीन, मेफेड्रोन और हाइड्रोपोनिक वीड जैसी ड्रग्स की कथित बरामदगी ने जांच एजेंसियों के सामने नेटवर्क की व्यापकता को लेकर कई सवाल खड़े किए हैं।

जांच में दिल्ली-NCR के अलावा पंजाब, मुंबई, हैदराबाद और गोवा तक कथित संपर्कों की भी बात सामने आई है। हालांकि, इन सभी कड़ियों की वास्तविकता और आरोपों की पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया तथा जांच के अंतिम निष्कर्षों से ही होगी।

आधुनिक ड्रग नेटवर्क का ढांचा पारंपरिक तस्करी मॉडल से काफी अलग हो सकता है। इसमें अलग-अलग लोगों को उत्पादन, वित्त, परिवहन, भंडारण और वितरण की अलग-अलग जिम्मेदारियां दी जा सकती हैं।

ड्रग नेटवर्क की आर्थिक रीढ़ तोड़ना बड़ी चुनौती

किसी बड़े ड्रग सिंडिकेट के खिलाफ कार्रवाई केवल गिरफ्तारियों और बरामदगी तक सीमित रहने पर उसका प्रभाव सीमित हो सकता है। नेटवर्क की आर्थिक रीढ़ को तोड़ना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह पता लगाना हो सकता है कि:

  • अवैध धन किन खातों या माध्यमों से पहुंचा?
  • किन लोगों या संस्थाओं के माध्यम से वित्तीय लेन-देन हुआ?
  • क्या अवैध कमाई से संपत्तियां खरीदी गईं?
  • हवाला या डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल हुआ या नहीं?
  • विदेशों में पैसा किन लोगों या नेटवर्क तक पहुंचा?

इन सवालों के जवाब उस नेटवर्क के उन हिस्सों तक पहुंचने में मदद कर सकते हैं, जो सामान्य ड्रग बरामदगी के दौरान सामने नहीं आते।

बसोया की पूछताछ पर टिकी निगाहें

अब जांच की दिशा में वीरेंद्र बसोया से होने वाली पूछताछ महत्वपूर्ण हो सकती है। यदि पूछताछ से विदेशों में मौजूद कथित ऑपरेटरों, भारत में सक्रिय सहयोगियों, वित्तीय चैनलों, ड्रग निर्माण से जुड़े ठिकानों और सप्लाई नेटवर्क के संबंध में नई जानकारी मिलती है, तो जांच को महत्वपूर्ण बढ़त मिल सकती है।

किसी बड़े आरोपी की गिरफ्तारी की वास्तविक सफलता केवल उसकी गिरफ्तारी तक सीमित नहीं होती। उसका महत्व इस बात से तय होता है कि जांच एजेंसियां उससे मिली जानकारी के आधार पर कितनी नई कड़ियों तक पहुंच पाती हैं और पूरे नेटवर्क को कितना नुकसान पहुंचा पाती हैं।

भारत की नारकोटिक्स रणनीति में बढ़ रहा अंतरराष्ट्रीय सहयोग

ड्रग तस्करी के बदलते स्वरूप ने भारतीय एजेंसियों के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग को और महत्वपूर्ण बना दिया है। अब जांच में सीमा, एयरपोर्ट और देश के भीतर की बरामदगी के साथ-साथ इंटरपोल, विदेशी कानून प्रवर्तन एजेंसियों, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय लेन-देन और डिजिटल नेटवर्क की भूमिका भी सामने आ रही है।

इंटरनेट, डिजिटल संचार, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रणालियों और तेज लॉजिस्टिक्स ने संगठित अपराध को सीमाओं के पार फैलने की क्षमता दी है। ऐसे में जांच एजेंसियों को भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित कार्रवाई की आवश्यकता है।

विदेश में बैठना कानून से बचने की गारंटी नहीं

वीरेंद्र बसोया की UAE से भारत वापसी का व्यापक संदेश यही है कि किसी कथित अपराध के बाद विदेश में रहना कानून से स्थायी सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकता।

हालांकि, इस कार्रवाई की वास्तविक सफलता का आकलन आने वाले समय में होगा। यदि जांच एजेंसियां इस मामले के माध्यम से कथित अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क के अन्य संचालकों, भारत में मौजूद सहयोगियों, वित्तीय चैनलों और सप्लाई नेटवर्क तक पहुंचने में सफल होती हैं, तो यह कार्रवाई ड्रग तस्करी के खिलाफ बड़ी कार्रवाई साबित हो सकती है।

सरकार की ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति की असली परीक्षा भी यहीं है—बड़ी बरामदगी के साथ पूरे नेटवर्क तक पहुंचना, आर्थिक स्रोतों को निशाना बनाना और संगठित तस्करी की संरचना को ध्वस्त करना।

फिलहाल वीरेंद्र बसोया की भारत वापसी को ड्रग तस्करी के खिलाफ जांच की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन असली कहानी अब शुरू होती है—पूछताछ से कौन-सी नई कड़ियां सामने आती हैं और जांच एजेंसियां कथित नेटवर्क की कितनी गहराई तक पहुंच पाती हैं, यही इस कार्रवाई की सबसे बड़ी कसौटी होगी।