लेख

मानवीय मूल्यों का संवाहक दशहरा*

*डाॅ0 कामिनी वर्मा*
एसोसिएट प्रोफेसर
काशी नरेश राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय ज्ञानपुर

हिन्दुस्तान तीर्थो और पर्वो का देश है। ये तीर्थ और पर्व जनजीवन में रच बसकर उसे जीवन्तता प्रदान करते हैं। वीरता और मानवीय मूल्यों का संवहन करता दशहरा पर्व जहां हमारे अन्दर ऊर्जा का संचार करता है वहीं इस बस बात की सीख भी देता है कि हमें झूठ और गलत का साथ नहीं देना है। सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने वाले हमेशा विजय पथ पर अग्रसर होते है।
दशहरा पर्व को उत्सव के रूप में मनाने के पीछे कई मान्यतायें लोकप्रिय है। एक लोकश्रुति के अनुसार देवी दुर्गा ने इसी तिथि को 9 रात्रि व 10 दिनों तक महिषासुर नामक असुर से युद्ध करके उस पर विजय प्राप्त की थी। उनकी इस विजय को सम्पूर्ण भारत में अत्यन्त हर्ष और उल्सास के साथ मनाया जाता है। अन्य मान्यता के अनुसार इसी दिन अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र श्री राम ने उनकी पत्नी सीता का हरण करने वाले लंका के राजा रावण का वध करकेआसुरी वृत्तियों का नाश कर मानवीय मूल्यों की स्थापना की थी अतः हर वर्ष अश्विन माह में शुक्ल पक्ष को बुराई के प्रतीक रावण के पुतले का दहन करके मानवीय नैतिक मूल्यों के संवर्धन को संकल्पित करता हुआ दशहरा पर्व राष्ट्रीय त्यौहार के रूप में सम्पूर्ण भारत में बहुत ही उत्साह और उमंग के साथ मनाया जाता है। एक अन्य मान्यता के अनुसार जुए में हार जाने के पश्चात् पाण्डवों को 12 साल का वनवास और एक साल का अज्ञातवास मिला। अज्ञातवास की अवधि में उन्हें अपनी पहचान गोपनीय रखनी थी अतः उन्होंने अपने हथियार एक शमी वृक्ष के नीचे रखे और छद्म वेश धारण किया। अज्ञातवास काल पूरा होने के पश्चात् दशमी तिथि को वह युद्ध क्षेत्र में गये और कौरवों को पराजित करके विजय प्राप्त की। पाण्डवों की यह विजय बुराई पर अच्छाई की विजय थी अतः इस विजय को ‘वियजादशमी’ के रूप में मनाया जाता है। वैसे तो दशहरा पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशी में मनाया जाता है लेकिन इसे आर्थिक समृद्धि के रूप में भी मनाया जाता है। भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि रहा है और इस समय नई फसलों के आने से भी उत्सव का वातावरण रहता है। प्राचीन काल में इस दिन औजारों और हथियारों की पूजा की जाती थी, क्योंकि इन्हें युद्ध में मिली जीत और समृद्धि के रूप में देखा जाता था। अतः इसे ‘आयुध पूजा’ के नाम से भी जाना जाता है।
सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करने पर दशहरे का वैज्ञानिक स्वरूप भी उभर कर सामने आता है। मौसम की दृष्टि से यह काल संक्रान्ति का काल होता है। वर्षा ऋतु समाप्त हो रही होती है तथा शीत ऋतु का आगमन होने वाला होता है। वातावरण में नमी होती है जिससे बहुत से हानिकारक कीटाणु, फफूंद आदि में तेजी से वृद्धि हो जाती है जो बहुत सी बीमारियों का कारण बनती है। दशहरा पर्व में रावण के पुतले के दहन से उत्पन्न उष्मा वातावरण की नमी को अवशोषित करके उसे शुष्क बनाता है जिससे यह हानिकारक कीटाणु स्वतः नष्ट हो जाते है साथ ही बहुत से जीवाणु अग्नि की ज्वाला में जलकर मर लाते है और वातावरण स्वच्छ व रोगरहित हो जाता है। परन्तु आज पुतले में विषाक्त पदार्थो का प्रयोग किया जा रहा है जिसपर गम्भीर विचार मंथन की आवश्यकता है।
विजय दशमी को दशहरा या विजोया के नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत भाषा में ‘दशहरा’ का अर्थ है। 10 बुराइयों को दूर करें। काम, क्रोध, मद, मोह, लोभ, मत्सर, आलस्य, हिंसा, चोरी, पर निंदा आदि बुराइयां आसुरी वृत्ति को जन्म देने वाली है। असंतोष, अलगाव, उपद्रवी आन्दोलन, अराजकता, असमानता, असामन्जस्य, अन्याय, अत्याचार, अपमान, असफलता, अवसाद, अस्थिरता मानव जीवन को आच्छादित करके किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति उत्पन्न कर देते हैं। इन संकीर्ण कुत्सित भावनाओं एवं समस्याओं का मूलकारण मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन है।
‘मानव मूल्य’ वह नैतिक विचार है जो धर्म और दर्शन से घनिष्ठ रूप से जुड़े है। ये दोनो ही नैतिक जीवन के आधार स्तम्भ है। भारतीय संस्कृति में समाहित ये नीति सिद्धान्त न सिर्फ नैतिक, सामाजिक एवं अध्यात्मिक मूल्यों को विशेष आधार प्रदान करते है अपितु उनका पोषण भी करते है।
‘मानवीय मूल्य’ मानवीय अभिवृत्तियां हैं। मानवीय मूल्यों की जननी ‘नैतिकता’ सद्गुणों का समन्वय है। यह व्यापक गुण है इसका प्रभाव मनुष्य के समस्त क्रिया कलापों पर पड़ता है और उसका सम्पूर्ण व्यक्तित्व उद्घाटित होता है। यह कर्तव्य की आन्तरिक भावना है जिसके माध्यम से सत्य-असत्य, अच्छा-बुरा तथा उचित अनुचित के बीच अन्तर किया जा सकता है। ये विवेक द्वारा संचालित होते है तथा मनुष्य के समग्र विकास का आधार है। इनके बिना व्यक्ति का सामाजिक जीवन दुष्कर हो जाता है। ये मानव मूल्य ही व्यक्ति को पशुता से ऊपर उठाते है। यह वह आचरण संहिता है जिसको जीवन में समाहित किये बिना किसी भी व्यक्ति समाज या राष्ट्र का विकास अधूरा है। मानवीय मूल्यों का विस्तार सार्वभौमिक एवं सार्वकालिंक है। व्यक्ति परिवार समाज राष्ट्र में यह व्याप्त है। आज वैयक्तिक और सामाजिक जीवन में जो तीव्रता से बदलाव हो रहा है उससे रिश्तों का ताना-बाना ही उलझ कर रह गया है। नैतिकता को समय सापेक्ष मानकर मानवीय मूल्यों की उपेक्षा की जा रही है जिससे नई-नई समस्याओं से समाज और राष्ट्र को सामना करना पड़ रहा है। मानवीय मूल्य सामाजिक जीवन को सरस व सुगम बनाते है। संगठनकारी शक्तियों को विकसित करते है। समाज को नियन्त्रित करते है। विश्वबन्धुत्व की भावना मानवमूल्यों को अंगीकर करके ही जागृत की जा सकती है। मानव मूल्य मानवता को गौरवान्वित करने वाले तथा धर्म, अर्थ, यश काम एवं मुक्ति को प्राप्त करने वाले है।
भारतीय संस्कृति में हर पहलू में मानव मूल्य समाहित है। व्यक्ति की पहचान उसके रंग, रूप, धन वैभव से न होकर उसके अन्तकरण में विद्यमान जीवन मूल्यों से होती है। इन मूल्यों के अभाव में व्यक्ति रीढ़ की हड्डी बिना शरीर के समान होता है। कोई भी बालक अच्छे या बुरे चरित्र के साथ नहीं जन्म लेता। ये मानवीय मूल्य है जो उसके चरित्र निर्माण को प्रभावित करते है। रावण भी वेदों का ज्ञाता व महान विद्वान था। उसकी विद्वता के कारण ही श्री राम ने समुद्र पर सेतु बनाने के पूर्व सेतु पूजा तथा शिवलिंग स्थापना पूजा के लिये रावण को आमन्त्रित किया था तथा युद्ध क्षेत्र में उसके धराशायी हो जाने पर श्री राम ने लक्ष्मण को उससे राजनीतिक शिक्षा प्राप्त करने के लिये भेजा था। परन्तु रावण में मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन हो गया। उसने क्रोध और अहंकार के वशीभूत होकर परस्त्री का हरण कर लिया। परिणाम सबके सामने है उसके साथ-साथ उसके सम्पूर्ण साम्राज्य और कुल का विनाश हो गया। उसकी मृत्यु कलंकित हुई और आज तक हम उसके पुतले को सामाजिक बुराई के प्रतीक के रूप में जलाकर उत्सव मनाते चले आ रहे है। प्रकाण्ड विद्वान होने के बाद भी विवेक बल और मानवीय मूल्यों का क्षरण हो जाने के कारण रावण का चरित्र कलंकित हो गया।
मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति मन है। मन की शक्ति अभ्यास है। इसी शक्ति से दुष्कर कार्य सम्पन्न किये जाते है। आत्मसंयम को मन की विजय माना जाता है। गीता में भी उल्लिखित है यदि मानव प्रतिदिन त्याग या मोह मुक्ति का अभ्यास करता रहे तो उसके जीवन में असीम शक्ति आ जाती है। भौतिक वादी समय में जहां व्यक्ति की सोंच बहुत संकीर्ण और स्वार्थी हो गई है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि मनोविकार मनुष्य को ग्रसित किये हुये है और अवसर पाते ही अपना नकारात्मक प्रभाव छोड़ने लगते है तथा व्यक्ति में आत्मसंयम की कमी के कारण मानवीय मूल्यों का हा्रस हो जाता है परिणामतः वह अनैतिक मार्गो को आत्मसात कर लेता है जिससे व्यष्टि और समष्टि में संवेत रूप से उसके यश का अपक्षय हो जाता है। अतः दशहरा पर्व सृष्टि के समस्त प्राणभूत तत्वों में सकारात्मक उर्जा के साथ नवचेतना को संचरित करता आ रहा है जिसके कारण समाज में सामाजिक एकता और समरसता बनी हुई है इसलिये यह त्योहार भारतीय संस्कृति में कालजयी रहेगा।