उत्तराखंड 2027: सरकार पर सवालों की बौछार, क्या जनता इस बार बदलेगी सत्ता का फैसला?

विपिन गौड़:-

देहरादून: उत्तराखंड की राजनीति अब निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। 2027 के विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही राज्य में सियासी तापमान लगातार बढ़ रहा है। एक समय तक राष्ट्रीय राजनीति के हाशिए पर रहने वाला यह छोटा पहाड़ी राज्य आज देश के राजनीतिक विमर्श का केंद्र बनता जा रहा है। वजह साफ है—बढ़ती जन-जागरूकता, अधूरे वादे और सरकार के कामकाज को लेकर गहराता असंतोष।

परंपरा टूटी, लेकिन क्या भरोसा भी टूट रहा है?

उत्तराखंड में लंबे समय तक सत्ता परिवर्तन का एक चक्र चलता रहा—कभी कांग्रेस, तो कभी भाजपा। लेकिन 2022 में भाजपा ने इस परंपरा को तोड़ते हुए लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और संगठन की ताकत का परिणाम माना गया।

हालांकि, यह जीत जितनी बड़ी थी, उतने ही बड़े सवाल भी उसके बाद खड़े होने लगे। तीन मुख्यमंत्रियों का बदलना—त्रिवेंद्र सिंह रावत, तीरथ सिंह रावत और फिर पुष्कर सिंह धामी—ने यह संकेत दिया कि सरकार के भीतर स्थिरता की कमी रही। इसके बावजूद, चुनाव हारने के बाद भी धामी को दोबारा मुख्यमंत्री बनाना पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व का बड़ा दांव था।

जमीनी हकीकत: पलायन, बेरोजगारी और बुनियादी ढांचे की गिरती स्थिति

आज उत्तराखंड जिन समस्याओं से जूझ रहा है, वे नई नहीं हैं, लेकिन उनका समाधान अब तक अधूरा है।

  • पलायन: पहाड़ों से लगातार हो रहा पलायन राज्य की सबसे बड़ी त्रासदी बन चुका है। सैकड़ों गांव “घोस्ट विलेज” में तब्दील हो चुके हैं।
  • शिक्षा: सरकारी स्कूलों में छात्रों की संख्या घट रही है, कई स्कूल बंद होने की कगार पर हैं।
  • स्वास्थ्य: पहाड़ी इलाकों के अस्पतालों में डॉक्टरों और सुविधाओं का अभाव है, जिससे वे केवल रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं।
  • रोजगार: युवा रोजगार के लिए राज्य से बाहर जाने को मजबूर हैं। बेरोजगारी के आंकड़े और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर सवाल लगातार उठते रहे हैं।

अवैध खनन और भ्रष्टाचार—सिस्टम पर सवाल

राज्य में अवैध खनन की गतिविधियां लगातार चर्चा में रही हैं। आरोप है कि यह सब प्रशासन की आंखों के सामने हो रहा है।
इसके साथ ही नकली माफिया, भूमि माफिया और होमगार्ड वर्दी घोटाले जैसे मामलों ने सरकार की छवि को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। विपक्ष ही नहीं, आम जनता भी अब इन मुद्दों पर जवाब मांग रही है।

अंकिता भंडारी हत्याकांड: जनभावनाओं का विस्फोट

धामी सरकार के कार्यकाल में सबसे बड़ा झटका अंकिता भंडारी हत्याकांड के रूप में सामने आया। इस मामले ने पूरे राज्य को झकझोर दिया।
जब इस मामले में सत्तारूढ़ दल से जुड़े लोगों के नाम सामने आए, तो लोगों का आक्रोश सड़कों पर फूट पड़ा।
स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि भाजपा के कार्यकर्ता भी सरकार के खिलाफ उतर आए—जो किसी भी सत्ताधारी दल के लिए गंभीर संकेत माना जाता है।

हालांकि मामला सीबीआई को सौंपा गया, लेकिन जनता के मन में आज भी कई सवाल अनुत्तरित हैं—क्या न्याय पूरी तरह हुआ? क्या दोषियों को सख्त सजा मिली?

संवेदनशील मुद्दों पर सरकार की भूमिका कटघरे में

  • भूमि कानून (Land Laws): राज्य में भूमि अधिकारों को लेकर लंबे समय से मांग उठ रही है, लेकिन इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए जाने के आरोप हैं।
  • आपदा प्रबंधन: उत्तराखंड एक आपदा-प्रवण राज्य है, फिर भी हर साल आपदाओं के दौरान व्यवस्थाओं की पोल खुलती है।
  • पुनर्वास: आपदा प्रभावित लोगों के पुनर्वास में देरी और अव्यवस्था ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं।

सरकार के भीतर खींचतान—एकता या औपचारिकता?

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, सरकार के भीतर ही असंतोष बढ़ रहा है। कई मंत्री और विधायक निर्णय लेने की प्रक्रिया से खुद को अलग-थलग महसूस कर रहे हैं।
यह भी चर्चा है कि कैबिनेट में कई ऐसे चेहरे हैं जो पहले कांग्रेस में थे, जिससे विचारधारा और कार्यशैली को लेकर टकराव की स्थिति बनती रहती है।

मीडिया की अनसुनी चेतावनी—लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी

सबसे गंभीर पहलू यह है कि राज्य के वरिष्ठ पत्रकारों और मीडिया संस्थानों ने समय-समय पर सरकार को विभिन्न जनहित मुद्दों पर पत्र, ज्ञापन और रिपोर्ट सौंपे।
इनमें पलायन, स्वास्थ्य सेवाएं, शिक्षा, अवैध खनन, भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे प्रमुख थे।

लेकिन, इन पर अपेक्षित कार्रवाई न होने से मीडिया जगत में भी असंतोष बढ़ रहा है। लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यदि लगातार चेतावनी दे रहा हो और सरकार उसे नजरअंदाज करे, तो यह स्थिति शासन व्यवस्था के लिए चिंताजनक संकेत मानी जाती है।

2027: सत्ता का चुनाव या सिस्टम की परीक्षा?

पुष्कर सिंह धामी ने अपने कार्यकाल की शुरुआत एक युवा और ऊर्जावान नेता के रूप में की थी। लेकिन समय के साथ उनके सामने चुनौतियां बढ़ती गईं।
अब 2027 का चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं रहेगा, बल्कि यह सरकार के प्रदर्शन की सीधी परीक्षा होगा।

जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं है—उसे परिणाम चाहिए।
अगर सरकार इन मुद्दों पर ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाती, तो 2027 का चुनाव उत्तराखंड की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकता है।