पत्रकार और साहित्यकार के बीच एक गहरा रिश्ता

साहित्य और पत्रकारिता के बीच अटूट रिश्ता रहा है। एक जमाना था जब इन दोनों को एक−दूसरे का पर्याय समझा जाता था। ज्यादातर पत्रकार साहित्यकार थे और ज्यादातर साहित्यकार पत्रकार। मीडिया और साहित्य में गहरा संबंध है। एक−दूसरे के बिना दोनों का काम चल नहीं सकता। सशक्त मीडिया ऐसी भूमि है जिस पर साहित्य का विशाल वटवृक्ष खड़ा हो सकता है। वास्तव में पत्रकारिता भी साहित्य की भाँति समाज में चलने वाली गतिविधियों एवं हलचलों का दर्पण है। वह हमारे परिवेश में घट रही प्रत्येक सूचना को हम तक पहुंचाती है। सत्य और तथ्य को बेलाग उद्घाटित करना रचनाधर्मिता है। साहित्यकार और पत्रकार का रचनाधर्मिता का क्षेत्र अलग−अलग होते हुए भी दोनों में चोली−दामन का साथ है। दोनों ही सम सामयिक समाज का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी लेखनी के माध्यम से समाज हित में सामाजिक मूल्यों और सम्वेदनाओं को दृष्टि प्रदान करते हैं। रास्ते अलग−अलग होते हुए भी दोनों की मंजिल एक है। दोनों ही संघर्ष पथ के राही के रूप में जीवन मूल्यों को प्रशस्त करते हुए दीनहीन की आवाज को बुलन्द करते हैं। शोषण विहीन समाज की स्थापना में दोनों का अहम योगदान है। साहित्य और पत्रकारिता ज्ञान के भण्डार हैं और समाज में जनजागरण का कार्य करते हैं। हिन्दी की साहित्यिक पत्रकारिता हिन्दी साहित्य के विकास का अभिन्न अंग है। दोनों परस्पर एक−दूसरे का दर्पण हैं। पत्रकारिता की विधा को भी साहित्य के अंतर्गत माना जाता है। बहुत से विचारकों ने पत्रकारिता को तात्कालिक साहित्य की संज्ञा भी दी है। विचार किया जाए तो समय−समय पर विभिन्न साहित्यकारों ने पत्रकारिता में अपना योगदान और पत्रकारों का मार्गदर्शन भी किया है।
पत्रकार और साहित्यकार वस्तुतः जनता के प्रतिनिधि होते हैं। वे जनता के सुख−दुख की आवाज को अपनी लेखनी के माध्यम से व्यक्त कर समाज को सही राह दिखाते हैं। पत्रकार में लेखक, साहित्यकार, कवि और सम्पादक के सभी गुण समाहित होते हैं। कहने का तात्पर्य है जो व्यक्ति समाज हित में समाजोपयोगी साहित्य का सृजन, निर्माण और विकास करता है वही साहित्यकार और पत्रकार कहलाता है। साहित्यकार और पत्रकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। पत्रकार का कार्य है समाज में घटित होने वाली सभी अच्छी बुरी घटनाओं को ज्यों का त्यों समाज के समक्ष परोसना। यदि पत्रकार इन घटनाओं के समाचारों को विश्लेषित कर उसे समाजोपयोगी बनाता है तो वह निश्चय ही साहित्य का सृजन कर रहा है। साहित्यकार अपनी रचनाओं को शाश्वत मूल्यों के साथ गद्य−पद्य विधाओं में सृजित करता है और फिर उसे प्रकाशन का रूप देता है। यह प्रकाशन समाचार पत्रों में क्रमिक रूप से होता रहता है। फिर उसे पुस्तकाकार का रूप देने का प्रयास करता है।
साहित्यकार अपनी रचनाओं का सोच−समझ कर सृजन करता है। इसके लिए उसके पास काफी समय होता है। इस समय का सदुपयोग वह अपने साहित्य को समाज हित में बेहतर और उपयोगी बनाता है। वहीं पत्रकार अपना रचना कार्य दैनन्दिनी रूप में करता है।

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